श्री परमपूज्य ब्रह्मचारी गुरुजी के नाम से प्रसिद्ध परमपूज्य ऋषिकल्प चतुर्वेद श्री६ विन्ध्येश्वरी प्रसाद शुक्ल जी का जन्म बस्ती जनपद के एक ग्राम में हुआ था। आपके पिता जी भी संस्कृत और आधुनिक विषयों के अद्भुत विद्वान् थे। परमपूज्य ब्रह्मचारी गुरुजी की बाल्यकाल से ही अद्भुत प्रतिभाशाली व धर्मनिष्ठ थे। पाँच वर्ष तक की अवस्था में आपने सम्पूर्ण श्रीरामचरितमानस कण्ठस्थ कर लिया था एवं उपनयन के पहले ही गणित, व्याकरण आदि विषयों में अच्छी प्रगति कर ली थी।
उपनयन के पश्चात् आपने मूँज, मेखला, कृष्णाजिन, दण्ड आदि धारण कर ४८ वर्ष तक अयोध्या, वाराणसी आदि विभिन्न स्थानों पर अनेक गुरुजनों से साङ्गोपाङ्ग वेद का अध्ययन किया। पुनः विवाह के पश्चात् भगवान् अग्नि नारायण की सेवा की। आपको शताधिक पूर्वजन्मों की बातें स्मरण थीं। भगवत्प्रेम, शास्त्रनिष्ठा, ज्ञान, वैराग्य, सरलता के तो आप साक्षात् मूर्तिमान् स्वरूप थे।
उत्तर भारत में जो कुछ भी अग्निहोत्र, सोमयज्ञ आदि का प्रचार हुआ है वह आपके ही तपस्या का परिणाम है। आपने अपने जीवन काल में सहस्रों शिष्यों को वेद व श्रौत का अध्यापन कराया। आप अत्यन्त वृद्ध हो जाने पर भी विना अध्यापन किये एक बूँद जल भी कभी गले से नीचे नहीं उतारा व एक पाद भी शास्त्र विरुद्ध कभी नहीं रखे। आपके कर्मों को देखने से शास्त्र का प्रायोगिक ज्ञान होता था।
आपके द्वारा किये गये वेद और श्रौत कर्म के प्रचार से आज उत्तर भारत पुनः वेद और श्रौत की ओर अग्रसर है।
श्री गुरु जी का परिचय
परमपूज्य ऋषिकल्प चतुर्वेद श्री ६ विन्ध्येश्वरी प्रसाद शुक्ल संस्थापक, श्रौत यज्ञ संवर्धन न्यास