अग्निहोत्र — श्रौत परंपरा

अग्निहोत्र क्या है

विवाह के समय या उसके पश्चात् पहले गृह्याग्नि का ग्रहण होता है। उसके उपरान्त श्रौत अग्नि का आधान होता है — जिनके नाम हैं — गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि। इन तीन अग्नियों में प्रतिदिन सायं प्रातः वेदोक्त विधि से जो होम होता है उसे अग्निहोत्र कहते हैं। ये अग्नि आधान काल से लेकर जीवन पर्यन्त यजमान के गृह में रहते हैं।

इन्हीं तीनों अग्नियों में अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त सभी यज्ञ होते हैं।

अग्निहोत्र की अनिवार्यता इसी से समझी जा सकती है कि सूतक काल में सभी शास्त्रीय कर्म जैसे सन्ध्या आदि का निषेध हो जाता है परन्तु अग्निहोत्र चलता ही रहता है। अग्निहोत्री अग्निहोत्र के लिए सूतक रहित होता है।

भगवान् राम के राज्य में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था जो अग्निहोत्री न हो और जिसने कोई सोमयाग आदि न किया हो। इसी से भगवान् राम का राज्य सर्वसुख सम्पन्न था। क्योंकि श्रीभागवत में कहा गया है — धनमिच्छेत् हुताशनात्। अन्यत्र सुखमिच्छेत् हुताशनात्। अर्थात् धन और सुख की इच्छा अग्नि नारायण से करनी चाहिए।

अग्निहोत्र न करने की निन्दा

यस्य वेदश्च वेदिश्च विच्छिद्येते त्रिपूरुषम्।
द्विर्नग्नः स तु विज्ञेयः श्राद्धकर्मणि निन्दितः।।
जिसके यहाँ वेद और अग्निहोत्र तीन पीढ़ी से नहीं हो रहा हो वह श्राद्ध कर्म में निन्दित है।

यस्य त्रिपुरुषादासीदुभयोर्गोत्रयोरपि।
वेदस्याग्नेश्च विच्छेदः सर्वकर्मसु निन्दितः।।
जिस पुरुष के मातृपक्ष और पितृपक्ष की तीन पीढ़ियाँ वेद और अग्निहोत्र से दूर हैं वह सभी कर्मों में निन्दित है।

तस्य लक्षणमाह सुमन्तुः —
यस्य वेदश्च वेदिश्च विच्छिद्येते त्रिपूरुषम्।
द्विर्नग्नः स तु विज्ञेयः श्राद्धकर्मणि निन्दितः।।
ब्राह्मण के दो वस्त्र हैं अग्निहोत्र और वेद। ये दोनों जिस पुरुष के यहाँ तीन पीढ़ियों से न हों वह ब्राह्मण दोनों तरफ से नग्न है।

अग्निहोत्र प्रशंसा

हारीतोऽपि —
नाग्निहोत्रात्परो धर्मो नाग्निहोत्रात्परं तपः।
नाग्निहोत्रात्परं दानं नाग्निहोत्रात्परो दमः।।२।।
अग्निहोत्र से श्रेष्ठ कोई धर्म नहीं है। अग्निहोत्र से श्रेष्ठ कोई तप नहीं है। अग्निहोत्र से श्रेष्ठ कोई दान नहीं है। अग्निहोत्र से श्रेष्ठ कोई इन्द्रिय निग्रह नहीं है।

नाग्निहोत्रात् परं श्रेयो नाग्निहोत्रात्परं यशः। नाग्निहोत्रात्परासिद्धिर्नाग्निहोत्रात्परागतिः।।३।।
अग्निहोत्र से श्रेष्ठ कल्याणकारी कोई वस्तु नहीं है। अग्निहोत्र से श्रेष्ठ कोई यश नहीं है।

नाग्निहोत्रात्परं स्नानं नाग्निहोत्रात्परो जपः। अग्निहोत्र से श्रेष्ठ कोई स्नान नहीं है।

सुहुतान्यग्निहोत्राणि ते यान्ति परमां गतिम्।।६।।
अग्निहोत्र करने वाला सबसे उत्कृष्ट गति को प्राप्त करता है।

अत्र स्वर्गश्च मोक्षश्च यो यथा गन्तुमिच्छति। आद्या व्याहृतयस्तिस्रः स्वधा स्वाहा नमो वषट्। यस्यैते वेश्मनि सदा ब्रह्मलोकस्थ एव सः।।७।।
अग्निहोत्र से स्वर्ग और मोक्ष दोनों प्राप्त होते हैं। व्याहृति, स्वधा, स्वाहा, नमस्कार, वषट्कार ये शब्द नित्य जिसके घर में गूंजते हैं वह सदा ब्रह्मलोक में ही निवास करता है।

अङ्गिरा अपि —
यो दद्यात्काञ्चनं मेरुं पृथिवीं च ससागराम्। तत्सायं प्रातर्होमस्य तुल्यं भवति वा न वा।।८।।
स्वर्णमेरु और सागर के सहित पृथिवी के दान का फल अग्निहोत्र के सायं प्रातः होम के फल के तुल्य है या नहीं इसमें संशय है।

यावतोऽपि शिलोञ्छाभ्यामहन्यहनि यत्फलम्। तद्दर्शपौर्णमासाभ्यां सम्यगाप्नोति वै द्विजः।।९।।
शिलोञ्छ वृत्ति से प्रतिदिन जो फल प्राप्त होता है वह फल द्विज दर्श-पौर्णमास से सम्यक् प्राप्त कर लेता है।

वायुपुराणेऽपि —
दर्श च पौर्णमासं च ये यजन्ति द्विजातयः। न तेषां पुनरावृत्तिर्ब्रह्मलोकात्कदाचन।।१०।।
दर्श-पौर्णमासेष्टि का यजन करने वालों की पुनरावृत्ति ब्रह्मलोक से कभी नहीं होती है।

नन्दन्ति पितरः सर्वे नृत्यन्ति च पितामहाः। प्रपितामहाश्च गायन्ति श्रोत्रियो गृहमागतः।।१४।।
श्रोत्रिय ब्राह्मण जिसके घर आता है उसके पितर प्रसन्नता से नृत्य करने लगते हैं।

अग्निहोत्रिणि विप्रे यः सहायत्वं प्रयच्छति। त्रिसप्तकुलसंयुक्तो मामैवेति न संशयः।
अग्निहोत्र के लिए जो ब्राह्मण की सहायता करते हैं उनके २१ कुल का उद्धार हो जाता है।